एक साथ सजे 108 मंगल चौके, श्रावकों ने नवधा भक्ति से मुनिराजों को कराया आहार दान

सुसनेर। अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर रविवार को जैन समाज ने भक्ति और समर्पण का एक अनूठा उदाहरण पेश किया। धर्म के प्रथम तीर्थंकर, देवाधिदेव भगवान आदिनाथ के प्रथम पारणा दिवस की स्मृति में रविवार को सकल दिगंबर जैन समाज सुसनेर के द्वारा एक अलौकिक आयोजन किया गया। भक्ति की ऐसी अविरल धारा बही कि पूरा नगर ‘आदिनाथ प्रभु’ और ‘गुरु भक्ति’ के रंग में सराबोर नजर आया। आयोजन का मुख्य आकर्षण 108 भव्य चौके रहे, जिसमें मुनिश्री 108 श्रवण सागर जी महाराज तथा मुनिश्री 108 ओकार सागर जी महाराज की सामूहिक पडगाहन के बाद आहारचर्या संपन्न हुई।
केसरिया उत्साह और भक्ति का संगम
आयोजन के दौरान प्रात: काल से ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर था। नगर के मुख्य मार्ग शुक्रवारिया बाजार,मउडी दरवाजा क्षेत्र को मनमोहक रंगोलियों से सजाया गया था। 108 परिवारों ने अपने-अपने निर्धारित चौकों (आहार स्थलों) को पूरी शुद्धता और मांगलिकता के साथ तैयार किया था। शुद्ध श्वेत और केसरिया वस्त्रों में सजे सैकडों श्रावक-श्राविकाएं हाथों में मंगल कलश और पूजन की थाली लिए मुनिराजों की प्रतीक्षा में खड़े थे।
108 चौकों में नवधा भक्ति का दृश्य
जैसे ही दिगंबर मुनि संघ का मंगल प्रवेश आयोजन स्थल शुक्रवारिया बाजार एवं मउडी दरवाजा पर हुआ, गुरुवर के जयकारों से क्षेत्र गुंजायमान हो गया। एक-एक कर मुनिराजों का ‘पड़गाहन’ किया गया। बाद में मुनिश्री 108 श्रवण सागर जी महाराज महेश कुमार जैन मिचीर्वाला परिवार के घर तथा मुनिश्री 108 ओकार सागर जी महाराज नीलेश कुमार लवीश कुंमार जैन के घर पहुंचे तो परिवारजनों ने उत्साह से भोजन की शुद्धता का उद्घोष के रूप में नमोस्तु महाराज, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि, आहार जल शुद्ध है, भोजनशाला में प्रवेश कीजिए श्रावकों ने पूरी विनम्रता के साथ मुनिराज के पाद प्रक्षालन किए, अष्टद्रव्य से पूजन कर ‘उच्चासन’ प्रदान किया। आहारचर्या का दृश्य देखने के लिए बडी संख्या में आसपास के शहरों से समाजजन पहुंचे थें।
गन्ने का रस से याद आया युग का प्रारंभ
जैन पुराणों के अनुसार, आज अक्षय तृतीया के दिन युगदृष्टा भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने 13 महीने और 13 दिन की कठिन तपस्या के बाद राजा श्रेयांस के हाथों ‘इक्षु रस’ (गन्ने का रस) का आहार ग्रहण कर दान तीर्थ की स्थापना की थी। इसी परंपरा को जीवंत करते हुए आज श्रावकों ने मुनिराजों को विशेष रूप से गन्ने का रस और पूर्णत: सात्विक प्रासुक भोजन भेंट किया। मुनिराजों ने भी आहार ग्रहण कर भक्तों को अक्षय पुण्य का आशीर्वाद दिया।
मुनिश्री ने दिए धर्मोपदेश
जो लोग धनी होते है वे लोग हमेंशा जरूरत के पास जाते है। तथा जो लोग भगवान की भक्ति में हमेंशा लगे होते है उनको जरूरत के पास जाना नहीं पडता है। दुनिया में 4 तरह के लोग है। एक वे जिनके पास माल तो है किंतु माला नहीं है। दूसरे वे लोग है जिनके पास माला भी है ओर माल भी है। तीसरे वे लोग है माला तो नहीं है किंतु माल नही है तथा चौथे वे लोग है जिनके पास माला है और ना ही माल है। उक्त बात अक्षय तृतीया के अवसर पर दिगंबर जैन बडा मंदिर में मुनिश्री श्रवण सागर जी महाराज ने धर्मोपदेश के दौरान कही।उन्होने कहां कि माला के अर्थ है भगवान की भक्ति व माल का अर्थ है धन है। इस अवसर पर मुनिश्री ओकार सागर जी महाराज ने अक्षय तृतीया का जैन धर्म में महत्व के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। इसके पूर्व आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज की पूजन पंडित मुकेश जैन ने करवाई। मंगलाचरण भूपेद्र जैन ने प्रस्तुत किया। दीप प्रज्वलन एवं मुनिश्री को शास्त्र भेट अन्य शहरों गंजबासोदा, नलखेडा, भवानीमंडी,धरोला,मोडी के समाजजजनों के द्वारा किया गया।

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